!! अब थोड़ा-बहुत होस्टल को देखना शुरू किया था मैंने !!
होस्टल में दो दिन बीत चुके थे। यहाँ की आदत तो अभी हुई नहीं थी लेकिन हाँ उम्मीद ख़त्म होने लगी थी कि पापा आकर मुझे यहाँ से ले जाएँगे। पहली बात तो ये कि उन्हें पता भी नहीं कि हाँ इतना रो रहे हैं और दूसरी बात ये कि उन्हें पता था कि होस्टल में शुरू में रोते ही है बच्चे। दो बाद अब थोड़ा-बहुत होस्टल को देखना शुरू किया था मैंने। धीरे-धीरे पता चल रहा था कि कौन-सी दीदी किस बैच की है? किससे बचके रहना है? कौन-सी सीनियर सीधी है कौन-सी ख़ूँख़ार(तब ऐसा ही लगता था, पता नहीं क्यों?) किसको देखकर आपस में बात भी नहीं करनी है नहीं तो शाम के प्रेयर के बाद बुला लेंगी। मेरी क़िस्मत थोड़ी नहीं काफ़ी अच्छी थी कि मेरा रूम उस फ़्लोर प था जिसमें सिर्फ़ फ़र्स्ट ईयर की ही लड़कियाँ थी। वरना कुछ बेचारी तो ऐसी थी जिनके फ़्लोर क्या रूम में भी सीनियर। मज़ाक़ की बात नहीं है तब के हिसाब से यह बहुत ही बेचारगी की हालत थी। किसी-किसी ने बताया था कि शुरुआत में जब रोती थी तो उसकी सीनियर बाल्टी लाकर दे दी थी कि इसे भरो। कुछ काम भी होगा। एक को तो रात में उठाकर ब्रेक डान्स करने कहा गया था।बड़ी-बड़ी कथाएँ और लीलाएँ...