!! चल पड़े अपने कॉलेज और होस्टल जीवन के एक नए सफर पे !!

तब स्कूल पास करते ही ऐसा लग रहा था कि अचानक से हम बहुत बड़े हो गए हैं। लेकिन जैसे ही घर से दूर होस्टल में जाने की बात आयी अंदर का बच्चा सहम गया। पहली बार घर से दूर वो भी किसी मौसी, बुआ के यहाँ नहीं होस्टल में। बाप रे कैसे रहेंगे, सोच सोचकर ही रोना आ रहा था। अपना सब काम ख़ुद ही करना होगा। सुबह उठना भी ख़ुद, चोटी भी ख़ुद ही बनानी होगी, कपड़े धोना, अपनी थाली-कटोरी धोना मतलब सब काम और पढ़ना तो सबसे बड़ा काम था ही। स्कूल में जो इस कॉलेज, उस कॉलेज के सपने पाले थे धीरे-धीरे उसकी हवा निकलने लगी थी। उत्साह डर में कैसे बदल रहा था पता भी नहीं चल पा रहा था।
कॉलेज ऐडमिशन तो पहले ही हो चुका था। पिछले सप्ताह रहने के लिए होस्टल भी तय किया जा चुका था।  अब तो बस जाना बचा था। सामान बाँधना शुरू कर दिया था घरवालों ने। सबसे पहले तो दो जोड़ी सलवार सूट मँगायी गयी क्योंकि जिस कॉलेज में ऐडमिशन हुआ था वहाँ बस इसी की अनुमति थी और स्कूल तो फ़्रॉक, स्कर्ट में ही निकल गया था। एक पेटी जिसमें किताब, कॉपी, साबुन, सर्फ़,ब्रश-जिब्भी,कंघी-तेल, थाली-कटोरी,निमकी, खजूरी,भुजा, अचार,पेड़ा जो जो माँ भर सकती थी सब भर दी। उसपर नाम, क्लास सब लिख दिया। एक बेडिंग जिसमें एक गद्दा,रज़ाई,तकिया,चादर। एक बैग जिसमें ज़्यादातर कपड़े ही थे। इसी बैग के अंदर के पॉकेट में एक छोटा-सा लाल रंग का चेन वाला बैग था जो गहने के साथ मिलता है। उसमें महीने के ख़र्च का पैसा रखा था। पहली बार अपने ख़र्चे के लिए पैसे मिले थे। पता नही चल रहा था कि ये ख़ुशी की बात है या दुःख की।

आख़िर जाने का दिन आ ही गया। वैसे एक दिन पहले जाना था लेकिन गुरुवार होने के कारण जाने का दिन एक दिन और आगे बढ़ गया था क्योंकि हमारे यहाँ गुरुवार को दक्षिण की ओर यात्रा नहीं करते। अगर बहुत जरूरी हो तो कर सकते हैं ब्रह्ममुहूर्त में ही जतरा निकाल ले जिसमें अपने सामान में से कोई रुमाल या तौलिया कुछ भी निकाल के रास्ते में पड़नेवाले किसी के घर रख देते थे और जब सुबह होने पे जाते समय उसे उठा लेते थे। ख़ैर जतरा, पतरा सब देखदाख के आख़िर दरवाज़े पे रिक्शा आ ही गया। खाना तो खाया जा नहीं रहा था सो माँ ने खाना पैक करके कपड़े वाले बैग में ही रख दिया। भगवान जी, गोसाइ, तुलसी चौरा, दादी, चाची, माँ सबसे आशीर्वाद लेकर निकलते समय ये नहीं पता था कि ये रिक्शा दुबारा नहीं छोड़ेगा मुझे मेरे इस घर में। उस दिन जो घर से निकले,निकले ही रह गए। फिर तो बस छुट्टियाँ बिताने ही घर जा पाए दुबारा से रहने नहीं। पढ़ने का टेबल, सोने का कोना सब उसी दिन छूट गया था लेकिन तब ये अहसास भी नहीं था।

सब रो रहे थे। बच्चे, बड़े सब। काम करनेवाली भी रो रही थी। चिंता थी कि पहली बार घर से अकेले निकल रही है कैसे रहेगी। रोने धोने के बीच एक सनसनाती हुई आवाज़ आयी कि रोने धोने में बस छुड़वा देना तुम लोग तब जाकर ये कार्यक्रम ख़त्म हुआ। रिक्शे में एक तरफ़ सामान भरा था दूसरी तरफ़ हज़ारों ख़्यालों से भरे हम। अजीब-सा डर था। वो इतना हावी हो गया था कि कुछ करने, बनने ये सारे सपने कहीं दुबक गए थे। कुछ छूटने का ऐसा अहसास उससे पहले कभी न हुआ था। शायद बाद में भी नहीं हुआ। उम्र की सरलता उस अहसास में थी शायद इसीलिए वो अहसास इतना मज़बूत था।

जब तक पीछे मुड़कर देखा जा सकता था तब तक नज़रें घर और घरवालों पे ही टिकी रही। जब दिखना बंद हो गया तो आगे मुड़ने के सिवा कोई और विकल्प नहीं रहा। जब तक उम्मीद होती है तभी तक नज़रें भी टिकी रहती हैं। रिक्शा जब गाँव से निकल रहा था तो खेत,बग़ीचा, सड़क सब देख-देख रोना आ रहा था। सबके छूटने का दुःख हो रहा था। आसपास दिखनेवाले सारे लोग इतने अपने लग रहे जितने कभी न लगे थे। रास्ते में अपना स्कूल भी दिखा जहाँ जिंदगी की कितनी सीखें मिली थी, कितनी सहेलियाँ, कितनी यादें जुड़ी थी। सड़क से वो पगडंडी दिख रही थी जिससे हम स्कूल आया जाया करते थे। जैसे जैसे रिक्शा बढ़ रहा था सब छूटा जा रहा था। हम सबको समेटना चाह रहे थे लेकिन समेटने के बदले और बिखरे जा रहे थे।

अब एक और उम्मीद जगी कि हे भगवान आज बसों की हड़ताल हो जाए। एकदिन तो और मिलेगा। या फिर रोड जाम हो जाए।कुछ हो जाए और हम न जाए। लेकिन जब बस स्टैंड पहुँचे तो वो उम्मीद भी टूट गयी। बस पकड़ने से पहले बाबा(दादाजी) से आशीर्वाद लेने गयी। जब भी हम कहीं जाते थे नानी के यहाँ या कहीं भी घूमने तो बाबा को प्रणाम करने ज़रूर आते थे। वो भी ख़ुश होकर क्योंकि बाबा से गोर लगाई सबसे ज़्यादा मिलता था। पर आज वो ख़ुशी नहीं थी। जबकि आज बाबा से सबसे ज्यादा गोरलगाई मिला था। बाबा ने मन लगाकर पढ़ने के लिए समझाया। रोए नहीं पर उदास वो भी थे।

और आख़िर में सामान बस के पीछे और हम बस में सवार हो चल पड़े अपने कॉलेज और होस्टल जीवन के एक नए सफर पे.....

Comments

Popular posts from this blog

!! नाम लिखी वो थालियाँ अलग निशान से सजे कटोरे !!

!! कॉलेज का पहला दिन !!