!! अब थोड़ा-बहुत होस्टल को देखना शुरू किया था मैंने !!
होस्टल में दो दिन बीत चुके थे। यहाँ की आदत तो अभी हुई नहीं थी लेकिन हाँ उम्मीद ख़त्म होने लगी थी कि पापा आकर मुझे यहाँ से ले जाएँगे। पहली बात तो ये कि उन्हें पता भी नहीं कि हाँ इतना रो रहे हैं और दूसरी बात ये कि उन्हें पता था कि होस्टल में शुरू में रोते ही है बच्चे। दो बाद अब थोड़ा-बहुत होस्टल को देखना शुरू किया था मैंने।
धीरे-धीरे पता चल रहा था कि कौन-सी दीदी किस बैच की है? किससे बचके रहना है? कौन-सी सीनियर सीधी है कौन-सी ख़ूँख़ार(तब ऐसा ही लगता था, पता नहीं क्यों?) किसको देखकर आपस में बात भी नहीं करनी है नहीं तो शाम के प्रेयर के बाद बुला लेंगी। मेरी क़िस्मत थोड़ी नहीं काफ़ी अच्छी थी कि मेरा रूम उस फ़्लोर प था जिसमें सिर्फ़ फ़र्स्ट ईयर की ही लड़कियाँ थी। वरना कुछ बेचारी तो ऐसी थी जिनके फ़्लोर क्या रूम में भी सीनियर। मज़ाक़ की बात नहीं है तब के हिसाब से यह बहुत ही बेचारगी की हालत थी। किसी-किसी ने बताया था कि शुरुआत में जब रोती थी तो उसकी सीनियर बाल्टी लाकर दे दी थी कि इसे भरो। कुछ काम भी होगा। एक को तो रात में उठाकर ब्रेक डान्स करने कहा गया था।बड़ी-बड़ी कथाएँ और लीलाएँ थी सीनियर और जूनियर की। इससे फ़ायदा ये हुआ कि सीनियर की साये में रहनेवाली फ़्रेशर जल्दी ही रोने-धोने के धूप से बच गयी। चाहे मजबूरी में ही सही। इधर अपना तो एक महीने तक सिलसिला चला था।
फ़र्स्ट ईयर में भी कुछ लड़कियाँ ऐसी थी जिन्हें न रोना पड़ता था न किसी सीनियर से डरना पड़ता था क्योंकि उनकी दो-चार बहन, बुआ, रिश्तेदार पहले से होस्टल में होते थे। फिर वो फ़्रेशर के कैप से बाहर आ जाती थी वो सिर्फ़ सबकी छोटी बहन होती थी। जिसका ध्यान रखना था कि घर से दूर उसे अकेला न लगे। वो रोए नहीं। लाड़, प्यार, पुचकार सब मिले। उन्हें देख पहली बार बड़ी बहन न होने का अफ़सोस हुआ था। दो बड़े भाइयों में से एक तो कम-से-कम बड़ी बहन होती तो आज हम भी सीनियर की कृपा दृष्टि के पात्र होते। पर हाय हम तो सिर्फ़ एक फ़्रेशर थे। सच में ये कमबख़्त वंशवाद कहाँ नहीं है? छोटे शहर के हॉस्टल से लेकर बड़े-बड़े राजभवनों तक। अब कोई कंगना रनौत तो थी नहीं हमारे बीच जो नेपटिज़म के ख़िलाफ़ झंडा लेकर खड़ी हो जाती। होस्टल की तब के सारे दुःख दर्द अब सुंदर याद बन चुके हैं पर ये बात अब भी खटकती है कि हम भी तो पंद्रह-सोलह साल के छोटी-बहन ही तो थे। ख़ैर इतनी ख़ुशियाँ है तो एक आध ग़म चलेगा।
सुबह में तो रोने का मौक़ा बहुत कम मिलता था क्योंकि नहाने का लाइन, बाथरूम का लाइन, कोचिंग, कॉलेज के लिए तैयार होना, समय पे कॉलेज पहुँचना, इसी बीच कुछ खाना भी। आठ पचास की पहली क्लास होती थी। रेल की तरह भागते थे हम सब। अभी दो दिन ही हुए थे तो प्रॉक्सी का पता भी नहीं चला था कि ऐसा भी कुछ जुगार होता है।
भागते-भागते कॉलेज पहुँचते। दो तीन बजे तक ठेक-हारे होस्टल पहुँचते। खाना खाते। फिर थोड़ा आराम, पढ़ाई इसी में शाम हो जाती। फ़िल्मों में पता नही किस कॉलेज के बारे में दिखाते हैं। हम पागल भी उसे सच समझ लिए थे कि कॉलेज जाएँगे तो एक डायरी पेन लेकर एक-दो घंटे के लिए घूम आया करेंगे। पर यहाँ तो स्कूल ही था बस हर क्लास एक कमरे में न होकर अलग-अलग कमरे होती थी। बाक़ी अभी तो कोई अंतर नहीं दिख रहा था।
रोज़ शाम को प्रेयर होता था जिसमें सबको सम्मिलित होना अनिवार्य था। कभी-कभी कोई गार्ड जी या ख़ुद मैडम भी राउंड में जाती थी चेक करने। जो भी कमरों में पाया जाता उनकी क्लास लगती। लेकिन जो वाक़ई बीमार होती उन्हें कुछ नहीं कहा जाता। शुरुआत में तो हम सब थोड़ा-बहुत बीमार हो तब भी रोज़ प्रेयर में जाते थे। बाद में तो बहुत सारी युक्तियाँ पता चल गयी थी। बाथरूम में दरवाज़ा खुला छोड़ उसके पीछे छुप जाना। एकसाथ थीं-चार बाथरूम में बंद हो जाना जिसमें किसी एक तो ही डाँट पड़ती थी और सबकी बारी बारी से बारी आती थी। बहुत सारे उपाय मिल गए थे।
प्रेयर में सारी लड़कियाँ बैचवाइज़ खड़ी होती थी। सबसे बड़ी लाइन फ़र्स्ट ईयर की ही होती थी। शुरुआते अवसर तो लड़कियों को मिल ही जाते हैं। दो प्रीफ़ेक्ट आगे खड़े होकर प्रेयर लीड करती थी। प्रीफ़ेक्ट का हर साल चुनाव होता था। ग्रैजूएशन सेकंड ईयर से होशियार, तेज़-तर्रार, होस्टल में पॉप्युलर, थोड़ी गम्भीर, थोड़ी लीडर टाइप लड़कियाँ इस पद की हक़दार होती थी। इनका काम था प्रेयर लीड करना, गार्डजी से चिट्ठियाँ लेकर उसकी पड़ताल कर मतलब पढ़कर फिर उसे उचित लड़की को देना, स्टडी पिरीयड में राउंड लगाकर चेक करना कि सब पढ़ रही हैं कि नहीं, अटेंडेंस लेना। ऐसी कई और भी जिम्मेदारियाँ होती थी इनकी।
प्रेयर के बाद अटेंडेस होता था। फिर सबको उनकी चिट्ठियाँ दी जाती थी। चिट्ठियों को पहले प्रीफ़ेक्ट द्वारा पढ़ा जाता था। असंवैधानिक चिट्ठीयों के मामले को मैडम तक पहुँचाया जाता था। असंवैधानिक मतलब माँ, पापा, भाई, बहन,चाची,मामी, फुआ जैसे रिश्तों से परे की चिट्ठियाँ। कई बार तो चिट्ठियों का सम्बोधन तो संवैधानिक होता था पर अंदर चुपके से असंवैधानिक तत्व की एंट्री हो जाती थी जो कई बार पकड़ में नहीं आती थी। वो तो पक्की सहेली से लड़ाई के बाद भांडा फूटता था। कुछ चिट्ठियाँ इतनी अच्छी होती थी कि उन्हें सबको पढ़के सुनाया जाता था। मेरी ही बैच की एक लड़की की मम्मी की चिट्ठियाँ इतनी सुंदर, मन तो टटोलनेवाली, हमें समझकर समझानेवलय होती थी कि सबको ही उनकी चिट्ठियों का इंतज़ार रहता था। बहुत अच्छे थे वो दिन जब हम चिट्ठियों की बाट जोहते थे। अच्छा था फ़ेसबुक, वट्स ऐप नहीं था। नहीं तो इतनी सुंदर यादें मन में संजोयी नहीं होती।
प्रेयर के बाद स्टडी पिरीयड शुरू होने में कुछ समय मिलता था। जो होस्टल की सबसे सुंदर दिनचर्या में एक थी। सबका साथ बैठकर स्नैक्स खाना। सबका मतलब ख़ास सहेलियाँ। चार-पाँच का ग्रूप तो होता ही था। कभी-कभी सिर्फ़ रूममेट्स ही होती तो कभी-कभी दूसरे रूम की भी। सब अपना-अपना नाश्ता निकालती। विशेष रूप से नमकीन ही होता। भुजा, मूँगफली, निमकी,अचार। सबको एक थाली में निकाल कर फिर साथ में खाते। बाद में तो होस्टल में समोसा और लिट्टी भी मिलने लगा था। दस रूपए के पाँच समोसे ले आते। सब दो-दो रुपए बाँट लेते। समोसे के साथ जो इमली की चटनी मिलती थी उसका तो सही में कोई जबाव नहीं था। वैसे जो समोसा, लिट्टी आदि बनाते थे शाम को वो पहले मेसवालों के साथ ही थे। कुछ लड़ाई हो गयी तो उन्होंने अपना अलग स्टार्ट अप शुरू कर दिया शाम के नाश्ते का। और ज़बरदस्त चल गया था उनका ये स्टार्ट अप। इसमें उनसे ज्यादा हमारा फ़ायदा हो गया था। अब हम समोसे के लिए सिर्फ़ कॉलेज की कैंटीन पे निर्भर नहीं थे अब। शाम के नाश्ते के साथ ज़्यादातर सभी लड़कियाँ होर्लिक्स पीती थी। बड़े से भगोने में मेसवाले पानी खौलकर रख देते। सब अपना-अपना ग्लास लेकर पहुँच जाती। नाश्ते में एक और वेराइटी होती थी वो मेस की सुबह वाली सब्ज़ी। ख़ासकर जब काले चने बनते थे लंच में तो शाम को अक्सर हम मेस से उसे ले आते थे। मेसवाले लंच के बचे चने छोटे बर्तन में निकालकर रख देते थे। फ़र्स्ट कम फ़र्स्ट सर्व जो पहले जाता ले आता। क्या स्वादिष्ट लगता था वो चना भुजा के साथ। लंच से ज्यादा स्वाद स्नैक्स में देता था।
स्टडी पिरीयड दो घंटे का होता था जिसमें सबको अपने कमरे में रहना अनिवार्य होता था और साथ में पढ़ना भी बशर्ते की उस समय उससमय उसका कोचिंग न हो। प्रीफ़ेक्ट के आने पे खड़े होना पड़ता था। जो नहीं होता उसे खड़ा कर दिया जाता। शुरुआत में मैडम अक्सर ही आती थी राउंड पे। सबको प्यार से समझाती, रोनेवालों को और अधिक प्यार मिलता।
स्टडी पिरीयड के बाद डिनर के लिए भागते थे हम। जल्दी चलो वरना सीनियर की लाइन लग जाएगी। सीनियर्स को भी पता था कि स्टडी पिरीयड ख़त्म होते ही इन भुक्कड़ बच्चों का जमावरा होगा तो वो भी आराम से ही आते थे। चुपचाप खाया, थाली धोयी और सिर झुकाकर सीढ़ी चड़कर वापस अपने फ़्लोर पे आ जाते। उसके बाद कोई पढ़ता, कोई रोता, कोई सोता।

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