!! होस्टल की सरस्वती पूजा !!
वैसे सरस्वती पूजा तो हम जब से पढ़ना-लिखना भी नहीं सीखे तब से देख रहे थे। लेकिन होस्टल में मेरी ये पहली सरस्वती पूजा थी। स्कूल के सरस्वती पूजा की तुलना में यहाँ का कार्यक्रम बहुत बड़ा था। बड़ा नहीं विशाल कह लें। एक-दो महीने पहले से ऐसे तैयरियाँ शुरू होती थी जैसे गाँव में बेटी की शादी से पहले करते देखा था लोगों को। बजट, प्लानिंग, मेहमानों की लिस्ट, खाने का मेन्यू, डेकोरेशन ऐसे हज़ारों काम होते थे। सही भी है। माँ का स्वागत तो भव्य ही होना चाहिए।
वैसे पूजा में तो पूरे होस्टल की लड़कियाँ सहायता करती थी लेकिन होस्टिंग की ज़िम्मेदारी ग्रैजूएशन सेकंड ईयर की लड़कियों की होती थी । मतलब बजट, प्लानिंग वग़ैरह। एक-दो महीने पहले से मीटिंग्स शुरू हो जाती थी। सबसे पहले जो काम शुरू होता था वो था चंदा की पर्ची काटने का। होस्टल की लड़कियों को तो एक निश्चित राशि योगदान करनी होती थी। कोचिंग वाले सर, कॉलेज के शिक्षक इनसे चंदा माँगती। उसके अलावा अधिक-से-अधिक राशि जमा करना एक लक्ष्य होता था। अब लड़कियाँ रोड पे जाकर बाँस से गाड़ियों को घेरकर चंदा तो इकट्ठा कर नहीं सकती थी न। तो परिचितों में ही प्रयास करती थी। होस्टल के अंदर सबसे सॉफ़्ट टारगेट होते थे मिलने आनेवाले अभिभावक उसमें भी विशेषकर भैया या जीजाजी। उनकी अच्छी पर्ची करती थी। और भैया, जीजाजी श्रेणी के लोग ज्यादा ना नुकर भी नहीं करते थे। इसमें भी कुछ लड़कियाँ होती थी जिन्हें मज़ा आता था भैया, जीजाजी की पर्ची कटवा कर लेकिन कुछ पहले ही चेता देती थी भैया को कि इससमय मत आना, दीदी लोग बैठी रहती हैं पर्ची काटने। अब भैया आएँगे, जीजाजी आएँगे तो पता तो चल ही जाएगा न दीदी लोग को।
असल में होता यूँ था कि जब भी किसी के गार्जियन आते थे तो गार्ड जी काम करनेवाले लड़कों को भेजते जिसके भी गार्जियन आए हो उसे बुलाने। अब वो लड़का गेट से ही चिल्लाते जाता था। फलाने ईयर की चिलाना दी आपके भैया आए हैं। जब तक दी उधर से जबाव न दे दें कि आ रही हूँ तब तक ये डुगडुगी बजती रहती थी। वैसे इसका फ़ायदा बहुत था। लड़की कहीं भी हो मेस में, कोचिंग में, रूम में, बाथरूम में कोई-न-कोई उस तक ये संवाद पहुँचा ही देता था। इसतरह जब काम करनेवाला लड़का भैया या जीजाजी के आने की ख़बर ब्रॉड्कैस्ट करता था तो फलाने ईयर की लड़की से पहले पर्ची काटने के लिए दीदी वहाँ पहुँच जाती थी। कई बार गार्ड जी भी बता आते थे पर्ची काटनेवाली दीदीयों को।
पापा के उम्र के लोगों जैसे चाचा, मामा, मौसाजी से चंदा निकलवाना आसान नहीं होता था अक्सर। ग्यारह, एक्कीस, एक्यावन से होते अधिकतम एक सौ एक तक जा पाता था आँकड़ा। इसके कई कारण थे पहला ये कि उनके ऊपर पहले से ही इतनी आर्थिक जिम्मेदारियाँ होती थी, दूसरा पर्ची काटनेवाली दीदी लोग हमारी सीनियर थी उनकी तो बेटी की उम्र की ही थी तो डाँट भी देते थे और सबसे आख़िरी कारण ये कि उनकी उम्र भैया या जीजाजी वाली नहीं थी जो लड़कियों को मना करना सम्मान के ख़िलाफ़ लगे। पापा टाइप लोगों से दीदी लोग भी डर के ही रहती थी। अलग ही आनंद था इन छोटे-छोटे पलों में। इसका अहसास तब भी था और आज भी है।
जैसे-जैसे सरस्वती पूजा का दिन पास आने लगता था वैसे वैसे गहमागहमी, चहल-पहल बढ़ने लगती थी। मीटिंग्स भी ज्यादा होने लगती थी। सबके कार्य क्षेत्र पहले ही बँट चुके होते थे। कोई फ़ोटोग्राफर से बात करती। कोई ग्रूप प्रतिमा का ऑर्डर, सरस्वती जी के पोशाक आदि का काम देखता, कोई मेहमानों की लिस्ट और निमंत्रण पत्र छपने से बँटने तक का ज़िम्मा लेता। कोई लाइट,साउंड, शमायना, टेंट वालों से सम्पर्क करता, खाने की तैयारी की ज़िम्मेदारी के लिए मेसवाले बहुत मदद करते। उन्हें लोगों की संख्या और मेन्यू बता देते तो वो उस हिसाब से राशन का अंदाज़ा दे देते। राशन लाना, खाना बनाना सब उन्हें के ज़िम्मे होता बस उन्हें पैसे दे दिए जाते। सबसे कमाल की बात ये होती कि सरस्वती पूजा के कार्यक्रम का खाना खाकर यक़ीन ही नहीं होता कि ये हमारे ही मेस में, हमारे ही मेसवालों ने बनाया है।
कार्यक्रम के रिहर्सल ज़ोर पकड़ चुका होता था। कहीं फ़ैशन शो की प्रैक्टिस हो रही होती तो कहीं ड्रामा की, कोई अपने डान्स की प्रैक्टिस कर रहा होता तो कोई गाने की। हर कोई व्यस्त, हर कोई मस्त। इन तैयारियों के बीच पूजा के दिन पहनने के लिए सुंदर सूट की भी तैयारी कर लेती थी लड़कियाँ। वैसे होस्ट करनेवाली लड़कियाँ अधिकतर साड़ी ही पहनती थी। उसका भी डिज़ाइन, कलर कुछ निश्चित किया जाता था।
सरस्वती पूजा की शुरुआत तो पूजा, अर्चना, मंत्रोचारण, हवन, आरती, प्रसाद ये सब तो होता ही था। पूजा की शुरुआत ही इसी से होती थी। लेकिन पूजा के कार्यक्रम में इंडीयन आइडल, सारे रे गा मा, टैलेंट हंट, लाफ़्टर चैलेंज, फ़ैशन शो सब होता था। सभ्यता, संस्कृति, आधुनिकता का बड़ा-ही सुंदर संगम होता था। सरस्वती पूजा के बाद होस्टल के स्टार्स छँटके निकलते थे। ख़ासकर फ़र्स्ट ईयर से। सही में जिसमें जो हुनर हो उसे मौक़ा मिले, उसे पहचाना जाए इससे बढ़िया बात और क्या हो सकती है।
सरस्वती पूजा से एक दिन पहले होस्टल माँ के स्वागत के लिए सजके तैयार हो चुका होता था। शाम को प्रतिमा लायी जाती। साथ में कुछ दीदी, मेसवाले, गार्ड जी और अन्य कुछ लोग होते। ठेले पे लायी जाती थी प्रतिमा, एक-दो लोग उसे सावधानी से पकड़ कर बैठे होते थे। होस्टल का बड़ा वाला गेट खुलता था उसदिन जो बहुत कम ही खुलता था। वो भी शाम के छः बजे के बाद। हम सब छोटेवाले गेट से ही आया जाया करते थे। सरस्वती जी की प्रतिमा सबसे सुंदर ली जाती थी। उनसे कोई समझौता नहीं। सच में बोलती-सी लगती थी माँ प्रतिमा में।
इधर पीछेवाले ग्राउंड में माँ का स्टेज तैयार होता था। सुंदर-सी झाँकी बनी होती थी बैकग्राउंड में। रंग-बिरंगे कपड़ों और रंगों से सज़ा माँ का स्थान जिसे देखकर आँखों के साथ-साथ दिल को भी सुकून मिलता था। माँ को वहाँ पधराकर सब बची-खुची तैयारियों को निपटाने में लग जाते थे।
इधर होस्टल के कमरों में भी अद्भूत माहौल होता था। कोई अपना सूट ट्राई कर रही है, तो कोई साड़ी की मैचिंग चूड़ी देख रही है, किसी ने कल ही बालों में मेहंदी लगा ली थी तो कोई आज लगा रही है, कोई हाथों में मेहंदी लगाकर सूखा रही है तो कोई सूखे मेहंदी पे तेल लगा रही है तो किसी की मेंहदी अभी लग ही रही है। मेंहदी लगवाने के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता था। एक-से-बढ़कर एक हुनर होस्टल में ही मौजूद था। कोई रात में ही शैम्पू कर रही है क्योंकि सुबह बहुत भीड़ रहेगी नहाने में। कोई दीदी का दिया एमपोर्टेड नेल पोलिश सहेलियों के साथ शेयर कर रही थी तो कोई अपनी बिंदी का कलेक्शन दिखा रही थी।
वाक़ई जीवन के सबसे सुंदर दिनों में वो दिन थे। लड़कियों के जीवन में होस्टल लाइफ़ उन्मुक्त पवन में बेख़ौफ़ साँस लेने-सा है, अपने कैन्वस पे मनपसंद रंग भरने-सा है। उसदिन से ज्यादा आज वो पल मन को गुदगुदा रहे हैं और आँखों को भीगा रहे हैं।
सरस्वती पूजा वाले दिन सब सुबह-सुबह नहा धोकर तैयार हो जाते। तीन बजे से ही नहाने की लाइन लगने लगती थी। कितनी भी बड़ी लाइन हो कभी कोई बिना नहाए नहीं बचता। बीच में न टंकी का पानी ख़त्म होता तो कोई गार्ड जी को आवाज़ लगाकर मोटर चलाने कहती। कभी-कभी ऐसा होता कि बाथरूम में पानी आना बंद हो जाता और बाहर पानी आता रहता क्योंकि दोनों का कनेक्शन अलग-अलग टंकी से था। अब कोई अंदर बाथरूम में फँस गया आधा नहाए तो बाहर से उसकी रूममेट उसे बाल्टी में पानी भरकर दे देती। बड़ा सुंदर-सा शोर होता था वो।
पूजा के समय तक सब तैयार हो चुकी होती। सबके गीले बाल होते क्योंकि सरस्वती पूजा को बाल धोकर वे बचपन से नहाते रहे हैं। गीले बाल, नए कपड़े, चेहरे पे ख़ुशी, मन में उल्लास। सरस्वती जी की प्रतिमा के पास पंडित जी पूजा करवाते, मंत्रोचारण, हवन, आरती। एक-दो घंटे लग जाते थे। पूजा तक सब उपवास रखती। पूजा के बाद प्रणाम कर, प्रसाद ले,टीका लगवाकर फिर लड़कियाँ कुछ खाती। ये सरस्वती पूजा का एक चरण पूरा हुआ था। वैसे बाहर के लोग दर्शन के लिए आ रहे थे, उन्हें प्रसाद दिया जा रहा था।
लेकिन भीतर शाम के कार्यक्रम की फ़ाइनल रूप रेखा तैयार हो रही थी। सारे अलग-अलग ग्रूप से रिपोर्ट लिया जा रहा था कि सब ठीक है न। शाम के कार्यक्रम की जो ऐंकरिंग करनेवाली थी उसकी लिस्ट से सब अपने परफ़ोरमेंस को मैच कर रहे थे कि उनका किस नम्बर पर है। सबको हिदायत दी जा रही रही थी अपना नम्बर आने से पहले सब स्टेज के पीछे तैयार होकर पहुँच जाए। बीच-बीच में अभिभावक भी आ रहे थे क्योंकि होस्टल की तरफ़ से उन्हें भी निमंत्रण पत्र गया था। क्या कहें उत्सव था उत्सव।
शाम होते ही गणमान्य अतिथियों का आना शुरू हो गया। कुछ की अगवानी मैम स्वयं कर रही थी। शहर और शिक्षा जगत के प्रतिष्ठित लोग थे। सेकंड ईयर की लड़कियाँ जो होस्ट कर रही थी वो भी स्वागत में लगी थी। लोगों को उनकी कुर्सी तक पहुँचने में मदद कर रही थी। रोज़ होस्टल में स्कर्ट, सलवार सूट में दिखने वाली लड़कियाँ एक तरह की सुंदर सलीकेदार साड़ी पहने, ओरगेनेजर बैज लगाए जब यहाँ वहाँ घूम घूमकर काम देख रही थी तो चलती-फिरती देवियाँ लग रही थी।
घंटे भर में पूरा पांडाल खचाखच भर चुका था। बाहर से आमंत्रित अतिथि, कोचिंग वाले शिक्षक, अभिभावक और हम सैकड़ों लड़कियाँ। माँ के स्टेज के बग़ल में एक और बड़ा स्टेज होता था जहाँ एक के बाद एक कला की सारी विधाएँ नित्य, गायन, वादन, नाट्य ,हास्य सब प्रस्तुत होनेवाले थे। कार्यक्रम की शुरुआत हमेशा सरस्वती वंदना या गणेश वंदना से होती थी। क्या सुंदर छवि होती थी वंदना पे नृत्य करती लड़कियों की। आँखों पे यक़ीन नहीं होता कि ये तो अपने बैच की चुपचाप रहने वाली पूजा है। बालों का जुड़ा बनाए, अलग ढंग से धोती की तरह साड़ी पहने, हाथों में महेन्दी, पैरों में महावर लगाए, बड़ी-बड़ी आँखों में गहरा काजल, बड़ी बिंदी वो तो बिल्कुल वैसे लग रही थी जैसे कत्थक, भरतनाट्यम् वाली नृत्यांगनाएँ होती है। सही में पहचान नहीं आ रही थी। प्रेम तो पहले से था और उसके लिए सम्मान भी बढ़ गया था।
यही विशेषता थी सरस्वती पूजा के कार्यक्रम की। जिसके अंदर माँ ने जो कला दी थी उसे उभारने, माँजने का अवसर मिलता था यहाँ। कार्यक्रम में एक से बढ़कर एक परफ़ोरमेंस। पूरी रात कैसे बीत जाती पता ही नहीं चलता। पता चलता तो पुराने चेहरे की नयी ख़ासियत। बीच में जाकर सब खा भी रहे थे। क्या स्वादिष्ट खाना होता था? एकदम शादियों वाला। खाना बाँटते भी मेसवाले ही थे। हर लड़की खाना देखने के बाद एक बार उन्हें ज़रूर देखती कि मेरे मेसवालों ने ही ये खाना बनाया है। कुछ तो मुँह पे ही कह भी देती। पर मेसवालों की भी क्या ग़लती। बजट और समय भी तो देखना होता है डेली के खाने में।
एक-दो बजे तक प्रोग्राम समाप्त होता। सबसे अंत में होस्ट करनेवाली लड़कियों का बैच पैरोडी करता। उस बैच की सारी लड़कियाँ मंच पे आती थी। मुखर, शर्मीली सब। ज्यादा शर्मीली होती वो किसी के साथ आती। पर आती ज़रूर। ये आख़िरी कार्यक्रम उनका अधिकार और सम्मान दोनों होता था।
अगले दिन विसर्जन में जमकर होली होती थी। लड़कियाँ होस्टल के बाहर विसर्जन के लिए नहीं जाती लेकिन गेट तक ही सारा कसर पूरा कर लेती थी। सच में बसंत -सा सुखद होता था वातावरण उसदिन। मौक़ा देख एक आध सीनियर को भी रंग मल देती थी। पकड़ी गयी तो सॉरी दीदी नहीं तो मौज। होस्टल के ग्राउंड से सीढ़ियों तक सब गुलाबी।
विसर्जन के बाद सरस्वती पूजा की सजावट उतरने लगती, पांडाल,लाईट सब खुलने लगते। लेकिन अभी भी एक बड़ा हिस्सा बचा था इस कार्यक्रम का। वो था अगले शनिवार एतवार में फ़िल्म देखने का कार्यक्रम। चंदा से बचे पैसों से पाँच-छः फ़िल्मों के कैसेट मँगाए जाते। बड़ी-सी स्क्रीन पे खुले ग्राउंड में लाईट ऑफ़ करके सैकड़ों लड़कियाँ जब फ़िल्म देखने बैठती तो पता नहीं चलता कि आसमान में तारे ज्यादा गजमगज़ हैं या हम। हर ईयर से एक-एक फ़िल्म की फ़रमाइश पूछी जाती थी। मुझे याद है एक़बार कोई थ्रिलर मूवी चल रही थी। रात के बाहर बजे। ग्राउंड खचाखच भरा था। अँधेरा तो कर ही रखा था। तरकीब मूवी थी शायद। उसमें एक सीन में डब्बे से कटा हाथ निकलता है। बाप रे! इतनी ज़ोर से चीख़ें हम सब एकसाथ की आसपास के घरों से लोग छतों पे आ गए। पहले तो ये देखने आए थे कि सब सही तो है बाद में सब सही देखा तो बड़ा सुनाया। हमें तो लगा कि अब आगे की मूवी देखने को नहीं मिलेगी लेकिन मिल गयी परमिशन। बस आगे की मूवी लाईट जलाकर देखी और ध्यान रखा की चिल्लाए नहीं। दो दिन तक चलता था ये प्रोग्राम।
सबसे अंतिम कड़ी होती थी सरस्वती पूजा के कार्यक्रम की ,तस्वीरें। फ़ोटो ख़ीचने वाले भैया सारे फ़ोटो लेकर आ जाते। लड़कियाँ उनके एलबम से जो जो फ़ोटो चाहिए होता उसका नम्बर और पैसे दे देती और दो दिन बाद उनको उनकी तस्वीरें मिल जाती। तब ये तस्वीरें बहुत अनमोल होती थी। जिनके पास है आज भी संभाल के रखी हैं।
उसके बाद ज़िंदगी फिर से पुरानी दिनचर्या में आ जाती थी। होस्टल, कॉलेज, कोचिंग,मेस यही सब।
सही में जो समय चला जाता वो कभी वापस नहीं आता। इसलिए जिस समय जो है उसे जी भर जी लें ताकि बाद में अफ़सोस न रहे कि काश!

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