!! कॉलेज का पहला दिन !!

शाम को ही सो गयी थी तो सुबह नींद जल्दी खुल गयी। सुबह क्या रात ही कह लें। सब ओर शांति थी। और अभी उठकर करते भी तो क्या? वैसे भी बाक़ी लोग सो रहे थे तो खटर पटर मचाना भी ठीक नहीं था।पता नही कौन कितनी देर से सोया हो। फिर से चुपचाप अपने बेड पे लेट गयी और अंधेरे को देखने लगी। बाहर कमरे का अँधेरा भीतर मन की उदासी का अँधेरा। आँखें बिल्कुल ख़ाली थी उसमें न नींद थी न सपने थे। नींद सोने से पूरी हो गयी थी और सपने भी सहम के मन के किसी कोने में छुप गए थे।
जब करने को कुछ न हो तो अक्सर पुरानी यादों का, बातों का पिटारा खुल जाता है। बस पहुँच गयी अपने घर, स्कूल में। यादें भी कमाल की चीज़ होती हैं कभी-कभी तो हर दवा, दुआ से अधिक असरदार होती है। सुंदर यादों की बयार ने मन को ऐसे सहलाया कि पता भी नही चला, कब नींद आ गयी। दुबारा नींद खुली लड़कियों की आवाज़ से। इसबार उठी तो मेरी रूममेट्स भी उठ चुकी थी। मुझे उठा देखकर एक ने कहा कि जल्दी जाओ बाथरूम में नम्बर लगा आओ। वैसे भी लम्बी लाइन है और भी लम्बी हो जाएगी। आज सबकी जल्दी क्लास है। लाइन लगाने का मतलब बाहर जाकर पूछना था कि अब तक किस-किस का नम्बर लग चुका है जो भी अंतिम हो उसे बोल देना कि तेरे बाद मेरा नम्बर होगा। बस नम्बर लगाने से काम नहीं चलता। बीच में निगरानी भी करनी पड़ती थी कि कोई बिना नम्बर के बीच में घुसकर नहा न ले।

अपनी रूममेट्स की मदद से मैं भी अपना नम्बर लगा आयी। पेटी से अपना ब्रश पेस्ट निकाल कर बाहर रखा। साबुन, कंघी, तौलिया सब भी तो अभी अंदर ही था। सब निकाला। बाथरूम से बाहर भी एक नल था जहाँ सब ब्रश कर रही थी, मैंने भी वही जाकर ब्रश कर लिया। वहाँ कुछ और नए चेहरे मिले, थोड़ी बातचीत हुई। सब बहुत जल्दी में थी। समय पे तैयार होकर कॉलेज पहुँचने की जल्दी। मेरा आज कॉलेज का पहला दिन था तो मैं भी लेट नहीं होना चाहती थी। सब काम इतनी जल्दी-जल्दी हो रहा था कि रोने का समय ही नहीं मिला सुबह में। सच में व्यस्तता दर्द की सबसे बड़ी मरहम है।

नहा धोकर नया सूट पहनकर कॉलेज के लिए तैयार हो गयी। किताबें तो अभी ली नहीं थी हाँ,कापी और पेन निकाल लिया था। लेकिन बाल बनाने के समय समस्या हो गयी। ख़ुद से बाल बनाने की आदत भी नहीं थी और बाल खुले रखने का फ़ैशन भी नहीं था। लम्बे बाल थे, माँ रोज़ स्कूल जाने से पहले दो चोटियाँ बनाया करती थी। अब क्या करें? काफ़ी देर तक मुझे अपने बालों से मशक़्क़त करते देख मेरी रूममेट समझ गयी कि मुझसे चोटी नहीं बन रही। तो उसने चोटी बना दी। एक चोटी बनायी। क्योंकि वो भी तो छोटी ही थी मेरी तरह, माँ थोड़े न थी। बड़ा अच्छा लगा उसका इसतरह बिन बोले मदद करना। तब पता नहीं था कि ये सब छोटी-छोटी बातें जीवन की सुंदर यादों का हिस्सा बन रही हैं।

अब सब तैयार हो चुके थे। बस कुछ नाश्ता करना बाक़ी था। सबने अपने-अपने बक्से से नाश्ता निकाला। बिस्किट,निमकी, खजूरी,ब्रेड,जैम,अचार। बहुत वेरायटी थी। अलग-अलग माँओं के हाथ का प्यार एकसाथ मिल गया था। सबने मिल बाँटकर खाया और निकल पड़े कॉलेज के लिए। आने के बाद मैं अभी तक एक बार भी नीचे नहीं गयी थी। मेरे फ़्लोर पे सिर्फ़ मेरे ही बैच की लड़कियाँ थी। मेरी रूममेट्स ने समझाया कि नीचे बहुत सारी सीनियर मिलेंगी। किसी को घूरना मत। आँखें नीची करके निकल जाना। किसी से आँखें टकरा भी जाए तो नमस्ते करके निकल लेना। नहीं तो शाम को क्लास लग जाएगी।

ज्यादा कुछ समझ नहीं आया न ही समझने की कोशिश की मैंने। सोचा जैसे ये लोग जाएँगी वैसे ही चली जाऊँगी। नहीं देखूँगी किसी को घूर के। थर्ड फ़्लोर से लगभग पाँच-दस मिनट के अंतर पर बीस पच्चीस लड़कियाँ उतरी। मैं भी उसी में थी। सेकंड फ़्लोर के पास एक लड़की नीचे से ऊपर आ रही थी। उतरने वाला झुंड साइड हो गया और वो बीच से वो ऐसे निकली जैसे बेचारी प्रजा के भीड़ से कोई राजा निकलता हो। उनके जाने के बाद पता चला ये सीनियर थी। कॉलेज के प्रथम दर्शन  से पहले प्रथम सीनियर के दर्शन हो गए थे। सब पता नहीं क्यों उन्हें देख कर डर, सिमट गयी थी। उनके साथ-साथ मैं भी सिमटी थी लेकिन उनमें ऐसा कुछ विचित्र नहीं था कि डरा जाए। जैसे हर काल की एक सभ्यता और संस्कृति होती है। यह भी होस्टल काल की संस्कृति थी शायद। अनेकों सीनियर को बिना उन्हें घूरे रास्ता देते, नमस्ते करते हम गेट पे पहुँच गए। वहाँ फिर से मेरी रूममेट ने समझाया कि यहाँ गार्ड जी के पास जो रजिस्टर पड़ा है उसमें अपना नाम, क्लास, जाने और आने का सम्भावित टाइम सब भर दो। आने के बाद आने का असली टाइम भी भर देना। वहाँ रजिस्टर के पास भी लाइन लगी थी।

अपनी-अपनी हाज़िरी भरकर जब गेट से बाहर निकली तो कुछ भी जाना पहचाना नहीं दिखा। अनजान लोग, अनजान दुकान, मकान। वैसे कॉलेज होस्टल से ज्यादा दूर नहीं था। इससे ज्यादा दूर तो हमारे घर से हमारा मंदिर था जहाँ हम रोज़ जाया करते थे।
लेकिन रास्ता बहुत लम्बा लग रहा था। गली से निकलकर बाएँ मुड़ना था वहाँ से कॉलेज का गेट दिखने लगता था। होस्टल से कॉलेज के बीच में काफ़ी दुकानें थी, चहल-पहल थी। लेकिन अनजाना चहल पहल सुंदर कम, भयानक ज्यादा लगता है। रास्ते में रिक्शेवाले, साईकल वाले, बाइक वाले सब थे। पर कोई भी पहचान का नहीं। कहाँ घर से स्कूल के लिए निकलते थे तो हर चेहरा कोई अपना होता था। हालचाल पूछते,बताते निकलते थे। यहाँ बचते-बचाते चल रहे थे।

कॉलेज के सामने हम सब पहुँच चुके थे। बड़ा-सा प्रवेश द्वार। शहर का सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज। जहाँ पढ़ना सपना होता था लड़कियों का। जहाँ तक पहुँचने के लिए स्कूल में बहुत मेहनत करी थी। जहाँ ऐडमिशन के लिए बहुत मिन्नत करी थी। कॉलेज का नाम बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था जिसे पढ़कर अपना वो सपना नींद से जागने लगा जो दर्द, दूरी में कहीं गुम गया था दो दिनों से वो सामने आ गया। कॉलेज द्वार से प्रवेश करते समय अच्छा लगा, बहुत अच्छा लगा। पिछले चौबीस घंटों में पहली बार अफ़सोस कम उम्मीद अधिक थी मन में। गेट पर भी आइकार्ड चेक हो रहा था ताकि सिर्फ़ कॉलेज की छात्राएँ ही अंदर जा सके।

अंदर पहुँचते ही बड़ा-सा फ़ील्ड, बड़ी-बड़ी इमारतें। कला भवन, विज्ञान भवन, प्रशासनिक भवन पता नही और क्या-क्या। ये कॉलेज तो सचमुच टीवी में दिखाए जानेवाले कॉलेज की तरह बड़ा, भव्य था। क्लास का समय होनेवाला था तो ज्यादा मुआयना किए बिना विज्ञान भवन की ओर भागे। पहली क्लास केमिस्ट्री थी शायद तभी मैथ और बायो दोनों की लड़कियाँ एकसाथ उधर ही भागी। क्लास रूम भी इतना बड़ा था जितना हमारा गाँव का पुश्तैनी दालान। क्लास रूम में फिर से हाज़िरी लगी। ये हाज़िरी यानी अटेंडन्स बहुत जरूरी चीज़ थी। परीक्षा में बैठने के लिए कम-से-कम पचहत्तर प्रतिशत अटेंडन्स अनिवार्य था। इसलिए क्लास के अंत में रहे न रहे लेकिन शुरू में रहना बहुत जरूरी था।

एक क्लास ख़त्म होने के बाद कुछ समय मिलता था फिर दूसरी क्लास होती थी। स्कूल की तरह नहीं था कि एक मैडम गयी  नहीं कि दूसरे सर आ गए। यहाँ तो दूसरी क्लास दूसरे कमरे में थी वो भी दूसरे फ़्लोर पे। केमिस्ट्री का अलग फ़्लोर, फ़िज़िक्स का अलग फ़्लोर। बड़ा भूल-भुलैया लग रहा था। दो क्लास के बाद डेढ़ घंटे का गैप था जिसमें हम होस्टल जाकर खाना खाकर आ सकते थे। या तो अभी जाकर खा आए या फिर सारी क्लास ख़त्म करके एक बार ही जाए। सबने सोचा कि एक़बार ही जाएँगे। अभी तब तक कॉलेज कैंटीन में जाकर कुछ हल्का-फुल्का खा लेते हैं। हम तीन-चार लड़कियाँ कैंटीन गयी वहाँ समोसा और चटनी लिया। क्या स्वाद था समोसे का और उससे भी बेहतर चटनी का। पहली चीज़ मिली मुझे ऐसी जो पहले से अच्छी लगी। एक लड़की ने सबके पैसे दे दिए। होस्टल जाकर बाक़ी सब उसे अपना-अपना हिस्सा दे देती। मेरे पास तो वैसे भी अभी पैसे थे नहीं। मैं होस्टल से लेकर आयी नहीं थी। कैंटीन में भी काफ़ी सीनियर थी लेकिन वो हमारे होस्टल की नही थी तो उनसे डरने की ज़रूरत नहीं थी। ये ज्ञान भी मुझे समोसे के साथ-साथ मिल गया।

बाक़ी की क्लास ख़त्म होने के बाद फिर से हम होस्टल चल पड़े। कॉलेज के गेट से निकल कर फिर से एक अनजान दुनिया-सा लगा होस्टल से कॉलेज के बीच का ये छोटा-सा रास्ता। बीच में हम कहीं नहीं रूके। न ज़रूरत थी, न ही अभी घूमने की आदत लगी थी। होस्टल पहुँच कर गेट पे रजिस्टर में आने की एंट्री करी और सीनियर को बिना घूरे, बचते बचाते अपने फ़्लोर पे आ गए। होस्टल आकर फिर से घर की, माँ की ज़बरदस्त याद आयी। स्कूल से घर आना याद आया। माँ की फ़िक्र, माँ का खाना याद आया। फिर आँसू छलक आए बेचारगी के। अपनी नयी थाली, कटोरी से स्टिकर हटाकर उसे साफ़ किया और मेस जाने के लिए  साथ हो ली अपनी रूममेट्स के।

मेसवाले ने भी नाम पूछकर अपने रजिस्टर में एंट्री कर दी। काफ़ी बड़े थे वे पर वे सीनियर नहीं थे। तो उनसे हम बात कर सकते थे, सवाल कर सकते थे, उनके सामने हंस-बोल सकते थे। वाक़ई अच्छे लोग थे। नाम, गाँव पूछा। फ़र्स्ट ईयर सुनकर उन्हें भी थोड़ी दया आ रही थी हम पर। ऐसा उन्होंने बोला नहीं उनके चेहरे के हाव भाव से लग रहा था। वहीं मेस में बैठकर हम सब खाना खाने लगे। तभी कुछ सीनियर भी पास के टेबल पे खाना खाने बैठी। हाय क्या ठाठ थे! अचार का डब्बा, घी का डब्बा, लम्बी-लम्बी बातें, बड़े-बड़े ठहाके।

हम सब जल्दी से अपना खाना निपटा वहाँ से निकल लिए। कॉलेज का पहला दिन बीत गया था। जहाँ पहुँचने के लिए अब तक मेहनत की थी वहाँ पहुँच चुके थे लेकिन बड़ा ख़ालीपन-सा लग रहा था। कोई भी तो नहीं था साथ। पंद्रह-सोलह साल में एक दिन भी जिनके बिना न बीता उनमें से कोई भी तो न था आसपास। फिर से सपने पे अकेलापन हावी होने लगा। रूम में पहुँचकर रोए बिना रहा नही गया। फिर से शाम, फिर से रोना, फिर से सिर दर्द और फिर से सोना।



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