!! होस्टल में पहला दिन !!

आज न बस ख़राब हुई,न रास्ते में कहीं जाम लगा। जब भी मन चाहता है कि आज कुछ ग़लत हो जाए उसदिन तो सब काम को सही होना होता है। वही हो रहा था आज मेरे साथ भी। कुछ नहीं तो मेरी ही तबियत ख़राब हो जाए, दो चार उल्टी ही हो जाए बस में। पर आज तो जैसे कुछ ग़लत होना ही नहीं था। हनुमान जी को भी सिफ़ारिश लगायी कि अगर आज कैसे भी घर वापस चले गए तो शनिवार को लड्डू के साथ सात बार हनुमान चालीसा पढ़ेंगे। पर वहाँ से भी कोई उम्मीद न दिखी फिर थक कर खिड़की से भागती सड़क और दौड़ते पेड़ ही देखने लगी। न चाहते हुए भी सफर बीत गया। हम एक और बस स्टैंड पहुँच चुके थे जहाँ से रिक्शा लेकर होस्टल पहुँचना था।

ऐसा नहीं था कि इस शहर में हम पहली बार आए थे। घर से डेढ़ दो घंटे की दूरी पर ही तो है। बुआ, मौसी, मामा कितने रिश्तेदार भी रहते हैं यहाँ। लेकिन इससे पहले हरबार यहाँ घूमने आए थे पर बोरिया बिस्तर लेकर रहने पहली बार आए थे वो भी किसी के घर नहीं होस्टल में। दो रिक्शा किया गया क्योंकि सामान ज्यादा था। एक पर हम और कुछ सामान और दूसरे पे पापा और कुछ सामान। दोनों रिक्शे आगे-पीछे ही चल रहे थे। बाज़ार से जब मेरा रिक्शा गुज़रा तो पहली बाज़ार के रंग-बिरंगे सामानों को देख उन्हें लेने की इच्छा नहीं हुई। देखने का भी मन नहीं कर रहा था। शहर की ये चमक धमक चिढ़ा रही थी आज। मन गाँव की गालियाँ ढूँढ रहा था। मन से चले या बेमन से सफर तो बीत ही जाता है, हम भी आख़िरकार पहुँच गए अपने नए ठिकाने पे।

होस्टल के आगे हमारा रिक्शा रूका। सामने बड़ा-सा गेट था जो कि अंदर से बंद था। पापा ने गेट खटखटाया तो अंदर से एक अधेड़ उम्र का आदमी निकला वो गार्ड जी थे। पापा ने उन्हें बताया कि पहले बात हो चुकी है ऐडमिशन के लिए आए हैं तो उन्होंने गेट खोल दिया और सामान भीतर रखने के लिए एक लड़के तो भी बुलाया।

अब हम गेट के भीतर आ चुके थे। अंदर काफ़ी चहल पहल थी। लेकिन जब मन के अंदर इतना सूनापन तो बाहर की चहल पहल भी कुछ नहीं होता। दोपहर का समय था। कुछ लड़कियाँ कॉलेज जा रही थी, कुछ आ रही थी। आने-जाने से पहले वो गेट पे रखे रजिस्टर पर अपना नाम और आने-जाने का समय लिखती थी। कुछ घूम-घूम के पढ़ रही थी तो कुछ हाथ में थाली लिए जाती भी दिखी शायद मेस में जा रही थी। कुछ प्यार से देखते जाती थी तो कुछ तो ऐसे घूर रही थी जैसे कोई पुराना हिसाब चुकाना हो।

पापा ने ऐडमिशन की फ़ॉर्मैलिटी पूरी कर दी। मुझे होस्टल की मैम के सुपूर्त करके अब जाने की तैयारी में थे। मन लगाकर पढ़ना, हम जल्दी आएँगे दुबारा, कोई दिक्कत हो तो मैडम को बताना और भी पता नही कितनी नसीहतों के साथ हम गेट के भीतर रह गए और पापा चले गए। एक सपने जैसे लग रहा था सब। इतनी जल्दी-जल्दी सब हो रहा था कि कुछ समझ ही नही आ रहा था। जिंदगी में पहली बार अपने बोरिया बिस्तर के साथ हम अकेले थे। घरवालों के बिना यहाँ अकेले रहना है मन अभी तक इसे स्वीकार कर नहीं पा रहा था। ऐसे लग रहा था जैसे किसी भीड़ में हम गुम हो गए हैं और आसपास कोई अपना नहीं दिख रहा है। न दिमाग़ काम कर रहा था न हाथ पैर। मूर्ति की तरह गेट की तरफ़ देखते खड़े थे। बस आँखें अपना काम पूरे ज़ोर शोर से कर रही थी। आँसू तो ऐसे बह रहे थे जैसे उसमें बहाकर हमें घर पहुँचा देंगे।

होस्टल में कई इमारतें थी। उन्ही में से एक इमारत की तीसरी मंज़िल पे मेरा कमरा था। मेरा सामान गार्ड जी ने वहाँ पहुँचा दिया।  उस फ़्लोर पे सारी फ़र्स्ट ईयर की ही लड़कियाँ रहती थी। मेरे कमरे में तीन लड़कियाँ पहले से थी चौथा बेड मेरा था। बाक़ी की मेरी रूममेट कॉलेज गयी थी। पर फ़्लोर पे काफ़ी लड़कियाँ थी। वहाँ पहुँच कर कुछ कम बुरा लग रहा था। ऐसे जैसे भीड़ में गुम हुए सारे बच्चे एक साथ हो। उनमें से कुछ ने समझाया भी कि मत रोओ। दो चार दिन में ठीक लगने लगेगा।

कहाँ से आयी हो? कितना परसेंट मार्क्स आया है? मैथ है या बायो? इन सवालों का सिलसिला शुरू हो गया था।
मैंने अपना सामान लगाना शुरू कर दिया। गद्दा,तकिया,चादर, रज़ाई सब बिछा लिए। सब करते हुए बीच-बीच  में जब नज़र होस्टल की दीवारों से टकराती तो मन काँप जाता कि ये घर नहीं है। अब यहीं रहना है। कैसे रहेंगे? सोच सोचकर कब रोने लगते पता ही नहीं चलता। सही में अगर जीवन में आँसू न हो तो आदमी पागल हो जाए।

बाक़ी लड़कियाँ मुझे अपना सामान ठीक करने के लिए अकेला छोड़ अपने-अपने कामों में लग गयी थी।  हम अपने बेड के कोने में जा बैठे और चुपचाप रोने लगे। इसके सिवा और कुछ सूझ ही नहीं रहा था। घर की बहुत याद आ रही थी। अभी सब क्या कर रहे होंगे, हम होते तो क्या करते,पापा भी अब पहुँचने वाले होंगे,  कितन कुछ चल रहा था दिमाग़ में पर सब बाहर निकल रहा बस आँखों से। सिर दर्द से फटने लगा था। विक्स और बाम मेरे सामान में था लेकिन मन नहीं कर रहा था निकाल कर लगाने का। दवाइयाँ भी थी पर ख़ुद से बाम लगाओ, ख़ुद से दवाइयाँ लो ये सोचकर और रोना आ रहा था।

तभी दरवाज़ा जिसे मैंने सटा दिया था वो खुला। मेरी रूममेट्स आ गयी थी। उन्हें पहले से पता था कि आज एक नयी लड़की आनेवाली है उनके रूम में। तीनों से जान पहचान हुई। सबने जल्दी-जल्दी कपड़े बदले और मेस में जाने के लिए तैयार हो गयी। मुझे भी बोला कि अपनी थाली-कटोरी निकाल लो। पर मैंने मना कर दिया कि  भूख नहीं है। उन्होंने भी मेरी हालत देख चलने की ज्यादा ज़िद नही की। बोली हम सब अपना खाना ऊपर ही ले आएँगे उसी में से थोड़ा खा लेना।

तीनों अपना खाना ऊपर कमरे में ले आयी थी। सबने ज्यादा-ज्यादा खाना लिया था। पर मुझे एक तो भूख नहीं लग रही थी दूसरा सिर दर्द से फट रहा था। पर उनकी फ़िक्र देख आधी रोटी किसी तरह खा ली। फिर अपना बैग खोला। दवाइयों में से सिर दर्द की दवाई और विक्स निकाला। दवाई तो ख़ुद खा ली पर विक्स एक रूममेट ने लगा दिया। शाम हो चुकी थी। मन भी बुझे सूरज की तरह हो रहा था। आगे पढ़ने, कुछ बनने के सारे सपने कहीं गुम हो गए थे। अब तो बस यही सपना था कि कब यहाँ से वापस अपने घर, अपने लोगों के बीच जाने का मौक़ा मिलेगा। रज़ाई में लेटे लेटे कब आँख लग गयी पता भी न चला।

होस्टल का पहला दिन आँसू से धुल-धुलकर समाप्त हो रहा था।







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