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Showing posts from February, 2018

!! पहली बार होस्टल से पिक्चर देखने जाना !!

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भगदड़-सी मची थी जैसे  हमारे पूरे होस्टल में आज क्या सीनियर क्या जूनियर सबका एक-सा था अंदाज़। हर  तरफ़ हो रही थी तैयारी  व्यस्त थी आज लड़कियाँ सारी  किसी के नहाने बारी,कोई पूछे  नेलपोलिश सूखी क्या तुम्हारी। कोई कहे कि बाल बना दो  कोई कहे खुले बाल है जाना  कोई समझाए पागल मत बन  खुले बाल का मतलब डाँट खाना। मेंहदी लगायी थी बालों में कल  तो तेल लगा नहीं सकती थी  सिरदर्द हो भी रहा है तो क्या  कुछ घंटे तो सह ही सकती थी। मेंहदी, शैम्पू,नेल पोलिश सबसे निपट चुके थे अब भागमभाग शांत हो चुकी बाहर प्रतीक्षा कर रहे थे सब। नया सूट, नयी सैंडल और सबकी आँखें चहक रही थी कहीं खुले बाल,कहीं चोटी तरह-तरह की इत्र महक रही थी। कोई पहली बार नही था ये होस्टल से पिक्चर दिखलाना पर हम नयी लड़कियों को आज पहली बार था जाना। बड़े परदे पे बड़ा सिनेमा और संग बैठी होंगी पक्की सहेलियाँ सोच सोच मन फुदक रहा था भावनाएँ कर रही थी अठखेलियाँ। किसी ने तो छुपाकर पेन का ढक्कन साथ में रख लिया था सीटी बजाने तो आती नहीं...

!! नाम लिखी वो थालियाँ अलग निशान से सजे कटोरे !!

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नाम लिखी वो थालियाँ अलग निशान से सजे कटोरे चम्मच गुम हो जाते अक्सर पता नहीं किस रूम में छोड़े। ग्लासों की अदला-बदली तो हरदिन की ही बात थी होती उनके ग्लास नहीं गुमते थे जो रोज़ उन्हें नहीं थी धोती। थाली,कटोरे, चम्मच, ग्लास पता नहीं गए कहाँ पर उन यादों का ज़ख़ीरा आज भी है दिल में यहाँ। चम्पी हो या मेहंदी लगाना या धोकर बाल धूप में सुखना कभी अकेले कहाँ होते थे कितना सुंदर था वो ज़माना। संग में पढ़ना, संग में खाना संग में हँसना, संग में रोना संग-संग होता आना-जाना संग में ग़लती, संग में बहाना। बिछड़ गयी कलियाँ,खिली अलग-अलग उपवन में पर यादों की ख़ुशबू महक रही अब भी सबके मन में। सहमी-सहमी खिली-खिली हम जैसे सरसों की डालियाँ धीरे-धीरे हुए पुराने जब फिर हमें भी आती थी गालियाँ। रोना-धोना फिर हुआ पुराना रफ़ टफ हुई  भोली-भालियाँ सिसकियाँ हो गयी विदा अब हर बात पे ठहाकें और तालियाँ। जितनी जल्दी बदले हम उससे भी जल्दी गुज़रे दिन तब कहाँ पता था एकदिन हम होंगे इन सबके बिन।