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!! पहली बार होस्टल से पिक्चर देखने जाना !!

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भगदड़-सी मची थी जैसे  हमारे पूरे होस्टल में आज क्या सीनियर क्या जूनियर सबका एक-सा था अंदाज़। हर  तरफ़ हो रही थी तैयारी  व्यस्त थी आज लड़कियाँ सारी  किसी के नहाने बारी,कोई पूछे  नेलपोलिश सूखी क्या तुम्हारी। कोई कहे कि बाल बना दो  कोई कहे खुले बाल है जाना  कोई समझाए पागल मत बन  खुले बाल का मतलब डाँट खाना। मेंहदी लगायी थी बालों में कल  तो तेल लगा नहीं सकती थी  सिरदर्द हो भी रहा है तो क्या  कुछ घंटे तो सह ही सकती थी। मेंहदी, शैम्पू,नेल पोलिश सबसे निपट चुके थे अब भागमभाग शांत हो चुकी बाहर प्रतीक्षा कर रहे थे सब। नया सूट, नयी सैंडल और सबकी आँखें चहक रही थी कहीं खुले बाल,कहीं चोटी तरह-तरह की इत्र महक रही थी। कोई पहली बार नही था ये होस्टल से पिक्चर दिखलाना पर हम नयी लड़कियों को आज पहली बार था जाना। बड़े परदे पे बड़ा सिनेमा और संग बैठी होंगी पक्की सहेलियाँ सोच सोच मन फुदक रहा था भावनाएँ कर रही थी अठखेलियाँ। किसी ने तो छुपाकर पेन का ढक्कन साथ में रख लिया था सीटी बजाने तो आती नहीं...

!! नाम लिखी वो थालियाँ अलग निशान से सजे कटोरे !!

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नाम लिखी वो थालियाँ अलग निशान से सजे कटोरे चम्मच गुम हो जाते अक्सर पता नहीं किस रूम में छोड़े। ग्लासों की अदला-बदली तो हरदिन की ही बात थी होती उनके ग्लास नहीं गुमते थे जो रोज़ उन्हें नहीं थी धोती। थाली,कटोरे, चम्मच, ग्लास पता नहीं गए कहाँ पर उन यादों का ज़ख़ीरा आज भी है दिल में यहाँ। चम्पी हो या मेहंदी लगाना या धोकर बाल धूप में सुखना कभी अकेले कहाँ होते थे कितना सुंदर था वो ज़माना। संग में पढ़ना, संग में खाना संग में हँसना, संग में रोना संग-संग होता आना-जाना संग में ग़लती, संग में बहाना। बिछड़ गयी कलियाँ,खिली अलग-अलग उपवन में पर यादों की ख़ुशबू महक रही अब भी सबके मन में। सहमी-सहमी खिली-खिली हम जैसे सरसों की डालियाँ धीरे-धीरे हुए पुराने जब फिर हमें भी आती थी गालियाँ। रोना-धोना फिर हुआ पुराना रफ़ टफ हुई  भोली-भालियाँ सिसकियाँ हो गयी विदा अब हर बात पे ठहाकें और तालियाँ। जितनी जल्दी बदले हम उससे भी जल्दी गुज़रे दिन तब कहाँ पता था एकदिन हम होंगे इन सबके बिन।

!! अब थोड़ा-बहुत होस्टल को देखना शुरू किया था मैंने !!

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होस्टल में दो दिन बीत  चुके थे। यहाँ की आदत तो अभी हुई नहीं थी लेकिन हाँ उम्मीद ख़त्म होने लगी थी कि पापा आकर मुझे यहाँ से ले जाएँगे। पहली बात तो ये कि उन्हें पता भी नहीं कि हाँ इतना रो रहे हैं और दूसरी बात ये कि उन्हें पता था कि होस्टल में शुरू में रोते ही है बच्चे।  दो बाद अब थोड़ा-बहुत होस्टल को देखना शुरू किया था मैंने। धीरे-धीरे पता चल रहा था कि कौन-सी दीदी किस बैच की है? किससे बचके रहना है? कौन-सी सीनियर सीधी है कौन-सी ख़ूँख़ार(तब ऐसा ही लगता था, पता नहीं क्यों?) किसको देखकर आपस में बात भी नहीं करनी है नहीं तो शाम के प्रेयर के बाद बुला लेंगी। मेरी क़िस्मत थोड़ी नहीं काफ़ी अच्छी थी कि मेरा रूम उस फ़्लोर प था जिसमें सिर्फ़ फ़र्स्ट ईयर की ही लड़कियाँ थी। वरना कुछ बेचारी तो ऐसी थी जिनके फ़्लोर क्या रूम में भी सीनियर। मज़ाक़ की बात नहीं है तब के हिसाब से यह बहुत ही बेचारगी की हालत थी। किसी-किसी ने बताया था कि शुरुआत में जब रोती थी तो उसकी सीनियर बाल्टी लाकर दे दी थी कि इसे भरो। कुछ काम भी होगा। एक को तो रात में उठाकर ब्रेक डान्स करने कहा गया था।बड़ी-बड़ी कथाएँ और लीलाएँ...

!! होस्टल की सरस्वती पूजा !!

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वैसे सरस्वती पूजा तो हम जब से पढ़ना-लिखना भी नहीं सीखे तब से देख रहे थे। लेकिन होस्टल में मेरी ये पहली सरस्वती पूजा थी। स्कूल के सरस्वती पूजा की तुलना में यहाँ का कार्यक्रम बहुत बड़ा था। बड़ा नहीं विशाल कह लें। एक-दो महीने पहले से ऐसे तैयरियाँ शुरू होती थी जैसे गाँव में बेटी की शादी से पहले करते देखा था लोगों को। बजट, प्लानिंग, मेहमानों की लिस्ट, खाने का मेन्यू, डेकोरेशन ऐसे हज़ारों काम होते थे। सही भी है। माँ का स्वागत तो भव्य ही होना चाहिए। वैसे पूजा में तो पूरे होस्टल की लड़कियाँ सहायता करती थी लेकिन  होस्टिंग की ज़िम्मेदारी ग्रैजूएशन सेकंड ईयर की लड़कियों की होती थी । मतलब बजट, प्लानिंग वग़ैरह। एक-दो महीने पहले से मीटिंग्स शुरू हो जाती थी। सबसे पहले जो काम शुरू होता था वो था चंदा की पर्ची काटने का। होस्टल की लड़कियों को तो एक निश्चित राशि योगदान करनी होती थी। कोचिंग वाले सर, कॉलेज के शिक्षक इनसे चंदा माँगती। उसके अलावा अधिक-से-अधिक राशि जमा करना एक लक्ष्य होता था। अब लड़कियाँ रोड पे जाकर बाँस से गाड़ियों को घेरकर चंदा तो इकट्ठा कर नहीं सकती थी न। तो परिचितों में ही प्रयास...

!! कॉलेज का पहला दिन !!

शाम को ही सो गयी थी तो सुबह नींद जल्दी खुल गयी। सुबह क्या रात ही कह लें। सब ओर शांति थी। और अभी उठकर करते भी तो क्या? वैसे भी बाक़ी लोग सो रहे थे तो खटर पटर मचाना भी ठीक नहीं था।पता नही कौन कितनी देर से सोया हो। फिर से चुपचाप अपने बेड पे लेट गयी और अंधेरे को देखने लगी। बाहर कमरे का अँधेरा भीतर मन की उदासी का अँधेरा। आँखें बिल्कुल ख़ाली थी उसमें न नींद थी न सपने थे। नींद सोने से पूरी हो गयी थी और सपने भी सहम के मन के किसी कोने में छुप गए थे। जब करने को कुछ न हो तो अक्सर पुरानी यादों का, बातों का पिटारा खुल जाता है। बस पहुँच गयी अपने घर, स्कूल में। यादें भी कमाल की चीज़ होती हैं कभी-कभी तो हर दवा, दुआ से अधिक असरदार होती है। सुंदर यादों की बयार ने मन को ऐसे सहलाया कि पता भी नही चला, कब नींद आ गयी। दुबारा नींद खुली लड़कियों की आवाज़ से। इसबार उठी तो मेरी रूममेट्स भी उठ चुकी थी। मुझे उठा देखकर एक ने कहा कि जल्दी जाओ बाथरूम में नम्बर लगा आओ। वैसे भी लम्बी लाइन है और भी लम्बी हो जाएगी। आज सबकी जल्दी क्लास है। लाइन लगाने का मतलब बाहर जाकर पूछना था कि अब तक किस-किस का नम्बर लग चुका है जो भी ...

!! होस्टल में पहला दिन !!

आज न बस ख़राब हुई,न रास्ते में कहीं जाम लगा। जब भी मन चाहता है कि आज कुछ ग़लत हो जाए उसदिन तो सब काम को सही होना होता है। वही हो रहा था आज मेरे साथ भी। कुछ नहीं तो मेरी ही तबियत ख़राब हो जाए, दो चार उल्टी ही हो जाए बस में। पर आज तो जैसे कुछ ग़लत होना ही नहीं था। हनुमान जी को भी सिफ़ारिश लगायी कि अगर आज कैसे भी घर वापस चले गए तो शनिवार को लड्डू के साथ सात बार हनुमान चालीसा पढ़ेंगे। पर वहाँ से भी कोई उम्मीद न दिखी फिर थक कर खिड़की से भागती सड़क और दौड़ते पेड़ ही देखने लगी। न चाहते हुए भी सफर बीत गया। हम एक और बस स्टैंड पहुँच चुके थे जहाँ से रिक्शा लेकर होस्टल पहुँचना था। ऐसा नहीं था कि इस शहर में हम पहली बार आए थे। घर से डेढ़ दो घंटे की दूरी पर ही तो है। बुआ, मौसी, मामा कितने रिश्तेदार भी रहते हैं यहाँ। लेकिन इससे पहले हरबार यहाँ घूमने आए थे पर बोरिया बिस्तर लेकर रहने पहली बार आए थे वो भी किसी के घर नहीं होस्टल में। दो रिक्शा किया गया क्योंकि सामान ज्यादा था। एक पर हम और कुछ सामान और दूसरे पे पापा और कुछ सामान। दोनों रिक्शे आगे-पीछे ही चल रहे थे। बाज़ार से जब मेरा रिक्शा गुज़रा तो पहल...

!! चल पड़े अपने कॉलेज और होस्टल जीवन के एक नए सफर पे !!

तब स्कूल पास करते ही ऐसा लग रहा था कि अचानक से हम बहुत बड़े हो गए हैं। लेकिन जैसे ही घर से दूर होस्टल में जाने की बात आयी अंदर का बच्चा सहम गया। पहली बार घर से दूर वो भी किसी मौसी, बुआ के यहाँ नहीं होस्टल में। बाप रे कैसे रहेंगे, सोच सोचकर ही रोना आ रहा था। अपना सब काम ख़ुद ही करना होगा। सुबह उठना भी ख़ुद, चोटी भी ख़ुद ही बनानी होगी, कपड़े धोना, अपनी थाली-कटोरी धोना मतलब सब काम और पढ़ना तो सबसे बड़ा काम था ही। स्कूल में जो इस कॉलेज, उस कॉलेज के सपने पाले थे धीरे-धीरे उसकी हवा निकलने लगी थी। उत्साह डर में कैसे बदल रहा था पता भी नहीं चल पा रहा था। कॉलेज ऐडमिशन तो पहले ही हो चुका था। पिछले सप्ताह रहने के लिए होस्टल भी तय किया जा चुका था।  अब तो बस जाना बचा था। सामान बाँधना शुरू कर दिया था घरवालों ने। सबसे पहले तो दो जोड़ी सलवार सूट मँगायी गयी क्योंकि जिस कॉलेज में ऐडमिशन हुआ था वहाँ बस इसी की अनुमति थी और स्कूल तो फ़्रॉक, स्कर्ट में ही निकल गया था। एक पेटी जिसमें किताब, कॉपी, साबुन, सर्फ़,ब्रश-जिब्भी,कंघी-तेल, थाली-कटोरी,निमकी, खजूरी,भुजा, अचार,पेड़ा जो जो माँ भर सकती थी सब भर दी। उ...