!! नाम लिखी वो थालियाँ अलग निशान से सजे कटोरे !!


नाम लिखी वो थालियाँ
अलग निशान से सजे कटोरे
चम्मच गुम हो जाते अक्सर
पता नहीं किस रूम में छोड़े।

ग्लासों की अदला-बदली तो
हरदिन की ही बात थी होती
उनके ग्लास नहीं गुमते थे
जो रोज़ उन्हें नहीं थी धोती।

थाली,कटोरे, चम्मच, ग्लास पता नहीं गए कहाँ
पर उन यादों का ज़ख़ीरा आज भी है दिल में यहाँ।

चम्पी हो या मेहंदी लगाना
या धोकर बाल धूप में सुखना
कभी अकेले कहाँ होते थे
कितना सुंदर था वो ज़माना।

संग में पढ़ना, संग में खाना
संग में हँसना, संग में रोना
संग-संग होता आना-जाना
संग में ग़लती, संग में बहाना।

बिछड़ गयी कलियाँ,खिली अलग-अलग उपवन में
पर यादों की ख़ुशबू महक रही अब भी सबके मन में।

सहमी-सहमी खिली-खिली
हम जैसे सरसों की डालियाँ
धीरे-धीरे हुए पुराने जब फिर
हमें भी आती थी गालियाँ।

रोना-धोना फिर हुआ पुराना
रफ़ टफ हुई  भोली-भालियाँ
सिसकियाँ हो गयी विदा अब
हर बात पे ठहाकें और तालियाँ।

जितनी जल्दी बदले हम उससे भी जल्दी गुज़रे दिन
तब कहाँ पता था एकदिन हम होंगे इन सबके बिन।

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